एक डाक्टर और बूढ़ी महिला की कहानी
" डॉक्टर बाबू जल्दी आइए , रमा जी की तबीयत फ़िर से बहुत ख़राब हो गई है "......!
एक बड़े डॉक्टर साहब के मोबाइल पर आधी रात को एक इमरजेंसी फ़ोन घनघनाता है औऱ डॉक्टर साहब बिना देर किए जितनी जल्दी वहाँ पहुंच सकते थे , झटपट चले आए ।
दरअसल रमा जी को फिर से दिल का दौरा पड़ा था औऱ उनकी हालत बेहद गंभीर थी।
डॉक्टर साहब ने सबसे पहले आते ही रमा जी को सुई दवाई देने के अलावे जो भी उस वक़्त जरूरी था वो किया , साथ ही उनके स्वास्थ्य का भी गहन परीक्षण किया ।
उसके बाद उन्होंने गीता को अपने पास बुलाकर उसे जबरदस्त फटकार लगाई।
गीता उस वृद्धाश्रम की मुख्य कर्मचारी थी जिसके जिम्मे उन सब बुजुर्गों की देख-रेख की जिम्मेदारी थी। अनाथ डॉक्टर साहब भी उस वृद्धाश्रम में नियमित रूप से वहाँ मौजूद लोगों की निःशुल्क औऱ निःस्वार्थ भाव से इलाज़ करने के लिए अपना समय निकाल कर आ जाया करते थे ।डॉक्टर साहब के लिए बस ये एहसास ही बहमूल्य था कि उन्हें यहाँ माँ बाप का प्यार मिल जाता था जिसके लिए वो बचपन से ही तरसते रहते थे ।
"तुम्हें पता है न रमा जी की शारिरिक स्थिति , फिर कैसे तुमने बिना मुझसे पूछे इन्हें बग़ैर अन्न जल के पूरे चौबीस घंटे भूखे रहने की इजाजत दी। जिसकी हर पल की धड़कनें औऱ साँसे बस दवाओं पर निर्भर है, वो दवा छोड़ दे ये खुदकुशी नहीं तो औऱ क्या है।" डॉक्टर साहब चिल्लाकर बोलते बोलते उत्तेजित हो गये ।
डॉक्टर साहब की बेचैनी बता रही थी कि वो रमा जी को लेकर कितने फिक्रमंद थे । हालांकि डॉक्टर साहब वहाँ मौजूद सभी का बहुत ख़याल रखते थे ।
डॉक्टर बाबू , मैंने रमा जी को बहुत समझाया , आपकी बताई बात भी कही , फिर भी उन्होंने अपने मन से बिना किसी को बताए निर्जला व्रत रख लिया । कहती थीं ,औलाद की सलामती का व्रत है करने दो , बड़ी मन्नतों से मेरी गोद में भगवान ने फ़िर से एक बेटा दिया है.....मैं इसे नहीं खो सकती...."
" बस करो "......गीता की बात बीच में ही काटकर फिर एक बार चीख पड़े डॉक्टर साहब..." वही संतान जिसने उन्हें इस उम्र में इस गंभीर बीमारी के साथ यहाँ वृद्धाश्रम में छोड़ दिया ये कहकर कि एक सप्ताह में आकर ले जाएगा। फिर उसी विधवा माँ का घर बेचकर विदेश भाग गया, हमेशा के लिए यहाँ बेसहारा छोड़कर। उसी सदमे ने दिल की बीमारी दे दी और अब उस बेटे के लिए व्रत....." कहते कहते भर्रा गयी थी डॉक्टर साहब की आँखें।
अब थोड़ा सा साहस बटोरकर गीता ने डॉक्टर साहब से कहना शुरू किया......." डॉक्टर बाबू ,दरअसल इस बार रमा जी ने आपके लिए निर्जला व्रत रखा था । वो परसों ही सबसे कह रही थीं कि उस डॉक्टर की माँ नहीं है तो क्या, मैं हूं न उसकी माँ जैसी औऱ वैसे भी वो मेरे लिए ख़ुद के बेटे से भी बढ़कर है ,जो इतना ध्यान रखता है मेरा । मैं इस बार जरूर अपने उसी डॉक्टर बेटे की सलामती , यशस्वी औऱ दीर्घायु होने के लिए निर्जला व्रत रखूँगी "........!
गीता के मुख से ये सुन उस अनाथ डॉक्टर बाबू का मुंह खुला का खुला ही रह गया ।
उसके बाद डॉक्टर साहब ने बीमार रमा जी के पैरों के पास ही बैठकर बाक़ी की सारी रात गुज़ार दी ।
गीता और उस वृद्धाश्रम में मौजूद सभी लोग भी रमा जी के लिए मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे।

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