दिल को छू लेने वाली कहानी - पिता का अपनी बेटी को पत्र

 


विवाह के बाद जब एक बेहद साधारण परिवार की बेटी पहली बार मायके से अपने ससुराल जाने लगी तो पिता ने अपनी बेटी को बड़े लाड़ से अन्य उपहारों के साथ एक सुगंधित अगरबत्ती का डब्बा भी दिया और उससे कहा कि बेटी, जब भी तुम अपने ससुराल में पूजा करोगी , तब इस अगरबत्ती को जरूर जलाना ।

लेकिन जब माँ ने लड़की के पिता को ऐसे कहते सुना तो उसे बड़ी अचरज हुई ।

माँ ने कहा.....हमारी लाड़ली बेटी पहली बार अपने मायके से ससुराल जा रही है , तो भला उसे कोई अगरबत्ती जैसी मामूली चीज भी देता है क्या ?

ये सुनकर पिता ने झट से अपनी जेब में हाथ डाला और जितने भी रुपये थे, वो सब भी अन्य उपहारों के साथ बेटी को दे दिए ।

ससुराल में पहुंचते ही लड़की की सास ने बहु के माता-पिता द्वारा उपहार स्वरूप अपनी बेटी को बिदाई में क्या दिया गया है ,जब यह देखा तो उसे वह अगरबत्ती का मामूली डब्बा भी नज़र आ गया ।

सारे उपहारों में कोई क़ीमती चीज़ न देख अंत में सास ने मुंह बना कर बहु को बोला कि कल पूजा में यह अगरबत्ती जला देना क्योंकि तुम्हारे बाप ने बड़े प्यार से ये उपहार तुम्हें दिया है ।

सुबह जब बेटी पूजा करने बैठी औऱ अगरबत्ती का डब्बा खोला तो उसमे से एक चिट्ठी निकली जिसमें लिखा था...

" बेटा यह अगरबत्ती एक बार जलाने के पश्चात स्वतः खुद को जलाती है , मगर संपूर्ण घर को सुगंधित कर देती है। इतना ही नही, आस पड़ोस के पूरे वातावरण को भी अपनी महक से सुगंधित व प्रफुल्लित कर देती है...! हो सकता है कि क़भी तुम अपने पति से किसी बात को लेकर कुछ समय के लिए रुठ जाओगी या कभी अपने सास-ससुर के व्यवहार से दुःखी हो जाओगी , कभी देवर या ननद से भी रूठोगी, कभी तुम्हे किसी से कुछ बाते सुननी भी पड़ जाए, या फिर कभी अडोस-पड़ोसियों के व्यवहार पर तुम्हारा दिल दुख जाये, तब तुम मेरी यह भेंट ध्यान में रखना । अगरबत्ती की तरह जलना, जैसे अगरबत्ती स्वयं जलते हुए पूरे घर और सम्पूर्ण परिसर को सुगंधित और प्रफुल्लित कर ऊर्जा से भरती है, ठीक उसी तरह तुम स्वतः सहन करते हुए ससुराल को अपना मायका समझ कर सब को अपने व्यवहार और कर्म से सुगंधित और प्रफुल्लित करना...।

बेटी चिट्ठी पढ़ फफक कर रोने लगी ।

सास ने जब बहू की रोने की आवाज़ सुनी तो लपककर उसके पास आयी , फ़िर पति और ससुरजी भी पूजा घर मे पहुंचे जहां बहु रो रही थी।

"अरे हाथ में कोई चोट लग गया क्या? पति ने पूछा।

"क्या हुआ यह तो बताओ , क्यों रो रही हो, ससुरजी बोले।

जब सास उसके अगल बगल देखने लगी तो उसे पिता द्वारा सुंदर अक्षरों में लिखी हुई चिठ्ठी नजर आयी, चिट्ठी पढ़ते ही उसने अपनी बहु को गले से लगा लिया और फिर चिट्ठी ससुरजी के हाथों में दी।

लेकिन ससुर ने चश्मा न पहने होने की वजह से चिट्ठी बेटे को देकर पढ़ने के लिए कहा।

सारी बात समझते ही संपूर्ण घर स्तब्ध हो गया।

"सास बोली ......अरे, यह चिठ्ठी फ्रेम करानी है। यह मेरी बहु को मिली हुई सबसे अनमोल भेंट है, पूजा घर के बगल में ही इसकी फ्रेम होनी चाहिए ।

और फिर सदैव वह फ्रेम अपने शब्दों से, सम्पूर्ण घर, और अगल-बगल के वातावरण को अपने अर्थ से महकाती रही, अगरबत्ती का वो डब्बा ख़तम होने के बावजूद भी...।

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